शुक्रवार 17 जुलाई 2026 - 15:38
सदी के अज़ीम शहीद; सर्वोच्च नेता सैयद अली खामनेई

28 फरवरी को सर्वोच्च नेता ने अपने जाननिसार साथियों, उच्च सैन्य कमांडरों, अपने सम्मानित परिवार, संतान, बेटी, बहू और क्रांतिकारी साथियों के साथ शहादत का प्याला पिया; यह घटना इस्लाम के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों और अविस्मरणीय स्मृतियों में गिनी जाती है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसीः 28 फरवरी को सर्वोच्च नेता ने अपने जाननिसार साथियों, उच्च सैन्य कमांडरों, अपने सम्मानित परिवार, संतान, बेटी, बहू और क्रांतिकारी साथियों के साथ शहादत का प्याला पिया; यह घटना इस्लाम के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों और अविस्मरणीय स्मृतियों में गिनी जाती है।

इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएँ घटित हुई हैं जो चौदह सौ साल बीत जाने के बावजूद आज भी ताज़ा हैं और जिनके प्रभाव मानवता, इस्लामी जगत और विशेष रूप से शिया विचारधारा पर स्पष्ट रूप से पड़ रहे हैं।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण घटना रसूले अकरम (स) का विदा होना है। इसके बाद हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की दुखद शहादत है, जिसने इस्लाम के इतिहास पर गहरे प्रभाव छोड़े।

फिर अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की शहादत है, जिसकी खबर रसूले ख़ुदा (स) ने अपने जीवन में ही दे दी थी। यह महान शहादत भी महीने रमज़ान में घटित हुई।

आज अमीरुल मोमिनीन की संतान, इमाम खामनेई भी उसी पवित्र महीने रमज़ान में अपने पूर्वजों की संगति में पहुँच गए।

इसके बाद इमाम हसन मुज्तबा (अ) की शहादत और फिर इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी, कर्बला की घटना और हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की शहादत है, जिसने इतिहास पर सबसे गहरे और स्थायी निशान छोड़े।

इसी तरह अहले बैत (अ) और उम्मत का मार्गदर्शन करने वाले महान विद्वानों पर भी इतिहास में अत्यंत कठिन और परीक्षा भरे दौर आए हैं।

पिछले तीन वर्षों में इतिहास ने एक बार फिर करवट ली है। एक लंबी ठहराव, ख़ामोशी और चुप्पी के बाद इतिहास में एक नई लहर उठी है और मानवता के भीतर ऐसी चेतना पैदा हुई है जिसने सोई हुई दुनिया को झंझोड़ कर फिर से मैदाने अमल में ला खड़ा किया है। फ़िलिस्तीन के शहीद, हमास के मुजाहिदीन, हिज़्बुल्लाह की नेतृत्व, ईरान के महान कमांडर और सबसे बढ़कर प्रतिरोध के नेता हज़रत इमाम खामनेई की दर्दनाक शहादतें इसी चेतना का हिस्सा हैं। हालाँकि इन शहादतों के वास्तविक स्थान और उनके प्रभावों को समझना आवश्यक है।

इमाम खामनेई की शहादत पर तीन वर्गों की प्रतिक्रिया

इमाम खामनेई की शहादत की खबर ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। इस्लामी गणराज्य ईरान की ओर से इस घोषणा के बाद यह पिछली सदी की सबसे बड़ी वैश्विक खबर बन गई। इस खबर ने दुनिया में भूचाल की सी स्थिति पैदा कर दी और विभिन्न वर्गों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त की, जो आगे भी जारी रहेगी।

पहला वर्ग हत्यारों, अत्याचारियों और उनके विचारों से सहमत लोगों का है। ये वे लोग हैं जिनके हाथ फ़िलिस्तीन, लेबनान, यमन, हिज़्बुल्लाह और हमास के निर्दोष लोगों के खून से रंगे हैं। ये निर्दयी और कठोर हृदय वाले तत्व दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों, चाहे मध्य पूर्व हो या पश्चिमी देश, हर जगह मौजूद हैं।

दूसरा वर्ग वह है जो इस महान त्रासदी से अत्यंत दुखी हुआ। उनके दिल रंज और ग़म से भर गए और उन्होंने महसूस किया कि आज वे यतीम हो गए हैं, क्योंकि उनके बेमिसाल नेता और रहनुमा का साया उनके सिर से उठ गया है। पाकिस्तानी जनता ने भी साबित किया कि ईरान से बाहर रहते हुए भी इस महान शख्सियत से उनकी मुहब्बत कितनी गहरी थी। बग़दाद, लेबनान और यमन सहित विभिन्न देशों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले, लेकिन पाकिस्तानी जनता ने जिस अंदाज़ में अपनी भावनाओं का इज़हार किया, वह अपनी मिसाल आप था और उनसे यही अपेक्षा भी की जाती थी।

तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो भावनाशून्य और उदासीन हैं। उन्हें न तो फ़िलिस्तीन की क़त्लो-ग़ारत (हत्याओं) पर अफ़सोस होता है और न ही मानवता की त्रासदियों पर कोई दुख महसूस होता है। मुसलमानों और अन्य जातियों में ऐसे व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या मौजूद है।

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जापान के एक चिड़ियाघर की तस्वीर बहुत वायरल हुई, जिसमें एक बंदर का छोटा बच्चा अपनी माँ की मौत के बाद एक गुड़िया को अपनी माँ समझ कर उस पर सिर रखकर सो रहा था। इस तस्वीर ने दुनिया भर के लोगों की भावनाओं को प्रभावित किया और अनगिनत लोगों ने इस पर अफ़सोस जताया।

बाद में फ्रांस में क्यूबा के राजदूत ने इस तस्वीर के साथ एक फ़िलिस्तीनी बच्ची की तस्वीर प्रकाशित की, जो अपनी गुड़िया पर सिर रखे अकेली रो रही थी, क्योंकि उसकी माँ और पूरा परिवार शहीद हो चुका था। बंदर के बच्चे की तस्वीर ने तो दुनिया को रुला दिया, लेकिन इस मासूम फ़िलिस्तीनी बच्ची के दर्द ने दुनिया के ज़मीर (विवेक) को नहीं जगाया। यही वे लोग हैं जिन्हें न तो फ़िलिस्तीन के बच्चों की शहादत पर अफ़सोस होता है, न उनके हत्यारों से कोई शिकायत, और न ही सर्वोच्च नेता जैसी महान शख्सियत की शहादत पर कोई मलाल (दुख) होता है।

अल्लाह तबारक व तआला क़ुरआने मजीद में इरशाद फरमाता है कि उसका एक अटल क़ानून यह है कि वह मनुष्यों को विभिन्न परीक्षाओं और आज़माइशों में डालता है ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि वास्तविक इंसान कौन है, मानवता से गिरने वाले कौन हैं, भावनाशून्य कौन हैं और वे कौन हैं जो सत्य के साथ खड़े रहते हैं। ऐसे अवसरों पर लोगों की वास्तविकता उजागर हो जाती है। हर पीढ़ी इसी परीक्षा से गुज़रती है और हर दौर में यह आज़माइश दोहराई जाती है।

सर्वोच्च नेता की यह शहादत अप्रत्याशित नहीं थी; न स्वयं नेता के लिए, न ईरानी जनता के लिए, न दुनिया के लिए और न ही हमारे लिए। बल्कि यह तो उनकी पुरानी आरज़ू (इच्छा) थी। आज उनके वे सभी बयान और वीडियो दुनिया के सामने मौजूद हैं जिनमें उन्होंने बारहा शहादत की तमन्ना का इज़हार किया था।

यह पहली बार नहीं था कि वे शहादत के करीब पहुँचे हों। उन्हें "ज़िंदा शहीद" कहा जाता था। इमामे राहिल (बुज़ुर्ग नेता), इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने भी उन्हें "ज़िंदा शहीद" की उपाधि से याद किया था। वे कई अवसरों पर शहादत की सीमा तक पहुँचे, लेकिन अल्लाह तआला ने उन्हें सुरक्षित रखा। उनका घायल बाज़ू (हाथ) उसी जद्दोजेहद (संघर्ष) की यादगार है। अल्लाह तआला ने इस महान ईश्वरीय ख़ज़ाने को एक बड़े उद्देश्य और एक महान ऐतिहासिक चरण के लिए सुरक्षित रखा था।

आख़िरकार ईश्वरीय योजना पूरी हुई और इस महान शख्सियत ने अपने जीवन में वे ऐतिहासिक सेवाएँ अंजाम दीं जिनकी मिसाल मिलना मुश्किल है। इस्लामी क्रांति की रक्षा, उसका प्रसार, ईश्वरीय शासन की स्थिरता, इमामत और विलायत की व्यवस्था की निरंतरता, और दुनिया के ज़ालिमों और अपराधी ताकतों के सामने दृढ़ता के साथ डटे रहना, ये सब इस महान ईश्वरीय ख़ज़ाने के अविस्मरणीय कारनामे हैं।

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